नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकार के दमनकारी प्लान

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मोदी सरकार बहुत जल्द शहरों में चल रहे माओवादी संगठनों की शाखाओं और समर्थकों पर धावा बोलने वाली है. सरकार को लगता है कि माओवादी गतिविधियां स़िर्फ दूरदराज के जंगलों में ही सीमित नहीं हैं, बल्कि अब वे देश के शहरों के लिए भी ख़तरा बन गई हैं. माओवादी संगठन जो अब तक जंगलों से अपनी गतिविधियां चला रहे थे, वे खुफिया एजेंसियों को चमका देकर अब देश के शहरों में घुसपैठ कर चुके हैं. सरकार अब उन पर कड़ी कार्रवाई की योजना बना रही है. खुफिया एजेंसियां नक्सलवादी संगठनों के हमदर्दों और विचारकों के ख़िलाफ़ सुबूत इकट्ठा करने में जुटी हैं. सरकार सुबूत इकट्ठा कर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और विचारकों की गिरफ्तारी की योजना पर काम कर रही है. 

naxal_bastarनक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया जाता है. जब यूपीए की सरकार थी, तब भी नक्सलियों और माओवादी आतंक से निपटने के लिए योजना बनाई जा रही थी. सरकार के कुछ मंत्री सैन्य कार्रवाई करने के पक्षधर थे. यहां तक कि सेना को भेजने की तैयारी हो चुकी थी. दो वजहों से कार्रवाई रुक गई. एक तो सेना ने ही मना कर दिया कि वह अपने ही देश के नागरिकों पर गोलियां नहीं चलाएगी और दूसरी वजह यह रही कि सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल के सदस्यों ने सैन्य कार्रवाई के ख़िलाफ़ अपनी राय जाहिर कर दी. अब सवाल यह है कि नक्सलवाद से निपटने के उपायों में नज़रिये का फ़़र्क क्यों है? वे कौन लोग हैं, जो माओवादियों के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई चाहते हैं और वे कौन लोग हैं, जो सैन्य कार्रवाई के पक्षधर नहीं हैं. उनके नज़रिये में इतना फ़़र्क क्यों है? इसमें कोई दो मत नहीं है कि नक्सलवाद एक समस्या है. यह एक हिंसक आंदोलन है. वे भारत सरकार और राज्य सत्ता के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. वे हिंसा के ज़रिये परिवर्तन लाना चाहते हैं. 1991 में वे क़रीब 40 ज़िलों तक सीमित थे, लेकिन आज 2015 में 270 ज़िलों में फैल चुके हैं. माओवादी संगठनों को भारत के प्रजातंत्र पर भरोसा नहीं है, अदालत पर भरोसा नहीं है. वे अपनी गतिविधियां जंगलों के अंदर से ही चलाते हैं. वे सामने नहीं आते हैं. सरकार ने उनके सभी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया है. गृह मंत्रालय यह मानता है कि माओवादियों का फैलाव 21 राज्यों में हो चुका है. दूसरी समस्या यह है कि उक्त संगठन जहां भी सक्रिय हैं, वहां पर उन्हें स्थानीय समर्थन हासिल है.
नक्सलवाद की समस्या को दो रूपों में देखा जाता है. कुछ लोग इसे क़ानून व्यवस्था की समस्या मानते हैं. उनका मानना है कि नक्सली हिंसा फैलाकर देश के ख़िलाफ़ विद्रोह कर रहे हैं, उनकी वजह से विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि वे दूरदराज के इलाकों में विकास कार्यों का विरोध करते हैं. इसके साथ ही माओवादियों पर पाकिस्तान और चीन से मदद लेकर देश को अस्थिर करने का भी आरोप लगता रहा है. इसलिए ऐसे लोगों का मानना है कि यह हिंसक आंदोलन है, इसलिए इसका जवाब स़िर्फ सैन्य कार्रवाई से दिया जा सकता है. ऐसे लोग नक्सलियों के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई चाहते हैं.
इसके ठीक उलट, एक दूसरा नज़रिया है. कुछ लोग इसे सामाजिक और आर्थिक समस्या मानते हैं. उनका मानना है कि चूंकि सरकार दूरदराज के इलाकों में जनता को मूलभूत सेवाएं-सुविधाएं मुहैया कराने में असफल रही है, रोज़गार देने में असफल रही है, वहां स्वास्थ्य सेवाओं एवं शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है, भ्रष्टाचार और नियम-क़ानून गांव एवं वनवासियों के हित में नहीं बनाए जाते हैं, इसलिए सरकारी तंत्र से आमजन का भरोसा ख़त्म हो रहा है. ऐसे लोगों का मानना है कि समाज में व्याप्त अन्याय, शोषण और पिछड़ापन ही नक्सलवाद जैसे आंदोलनों का मूल कारण है. आमजन की नाराज़गी इन आंदोलनों के लिए उर्वरक का काम करती है. इसलिए इसका उपाय सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था में बदलाव और सुधार है.
यह बात भी सच है कि जबसे भारत में नक्सलियों का उदय हुआ है, तबसे इस समस्या का सामाजिक और आर्थिक नज़रिये से उपाय नहीं किया गया. हर बार भारत सरकार और राज्य सरकारें इसका ताकत के बल पर दमन करने की कोशिशें करती रही हैं, लेकिन वे इस पर पूरी तरह काबू पाने में विफल रही हैं. यह समस्या एक राज्य से उठकर दूसरे राज्य और दूसरे से तीसरे-चौथे राज्य में पहुंच जाती है. सरकार ने सीआरपीएफ को लगाया, लेकिन उसे भी सफलता नहीं मिली, उलटे सीआरपीएफ के सैकड़ों जवान शहीद हो गए. जबसे नरेंद्र मोदी की सरकार आई है, तबसे इस बात का अनुमान लगाया जा रहा था कि केंद्र सरकार नक्सलियों के ख़िलाफ़ एक निर्णायक लड़ाई लड़ेगी. भारतीय जनता पार्टी नक्सलवाद को क़ानून व्यवस्था की समस्या मानती है. इसलिए वह ताकत के बल पर निपटने की पक्षधर है.
गृह मंत्रालय ने रेड टेरर यानी लाल आतंक यानी नक्सलियों से निपटने के लिए नई रणनीति बनाई है. इस रिपोर्ट में नक्सलियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की बात कही गई है. इसमें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के बारे में बताया गया है कि उसकी शाखाएं 21 राज्यों में अलग-अलग नामों से चल रही हैं. गृह मंत्रालय ने खुफिया एजेंसियों से उक्त संगठनों की गतिविधियों पर नज़र रखने और उनके ख़िलाफ़ सुबूत इकट्ठा करने का आदेश दिया है. गृह मंत्रालय ने देश भर में 128 संगठनों को चिन्हित किया है, जिनका रिश्ता माओवादी और नक्सली संगठनों से है. उक्त सभी संगठन देश के अलग-अलग शहरों में अपनी गतिविधियां चला रहे हैं. खुफिया एजेंसियों ने उक्त संगठनों को अपने रडार पर ले लिया है. उन पर निगरानी रखी जा रही है. गृह मंत्रालय के नोट में बताया गया है कि उक्त संगठन देश के अलग-अलग शहरों में आंदोलनात्मक गतिविधियों में शामिल हैं, जिससे वे अपनी पार्टी के लिए जन-समर्थन तैयार करते हैं और सशस्त्र विद्रोह की तैयारियों में जुटे हैं.
गृह मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, उक्त संगठनों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई सरकार की प्राथमिकता है. खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक, उक्त संगठन शहरों में रहकर नक्सली संगठनों की मदद करते हैं, नक्सलियों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष गतिविधियों के बीच कड़ी का काम करते हैं, समन्वय बैठाते हैं. उनकी भूमिका मुख्य रूप से नक्सली संगठनों के ऑडियोलॉग यानी विचारक की होती है. साथ ही यही वे लोग हैं, जो शहर के पढ़े-लिखे युवाओं को बहला-फुसला कर संगठन में भर्ती करते हैं और उनका ब्रेनवाश करके उन्हें जंगलों में भेजते हैं, ताकि उनका आंदोलन जीवित रहे. गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, इस तरह के संगठनों की पहचान हो गई है. अब स़िर्फ यह साबित करना बाकी है कि वे सशस्त्र विद्रोह के न स़िर्फ हमदर्द हैं, बल्कि सशस्त्र विद्रोह के शहरी चेहरे हैं. बिना कोई ठोस सुबूत उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करना कठिन है, क्योंकि वे लोग शहरों में मज़दूर संगठनों, सामाजिक संगठनों और एनजीओ में घुसपैठ कर चुके हैं. खुफिया एजेंसियों को माओवादियों की शहरों में संगठन बनाने की रणनीति का तब पता चला, जब 2009 में दिल्ली में कोबाड गांधी को गिरफ्तार किया गया था. छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, पश्‍चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में नक्सली प्रभावशाली हैं. इन राज्यों के शहरों में खुलेआम उनकी कार्रवाई होती है. इन राज्यों में उक्त संगठन पहले से सक्रिय हैं, लेकिन अब वे दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और केरल में भी सक्रिय हैं. गृह मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, दिल्ली और एनसीआर (नेशनल कैपिटल रीजन) के अंदर सक्रिय कई संगठनों की पहचान हो चुकी है, जिनके तार माओवादियों से जुड़े हुए हैं. गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, शहरों में सक्रिय माओवादी संगठनों से जुड़े विचारक सुनियोजित और संगठित होकर राज्य के ख़िलाफ़ प्रोपेगंडा करने में शामिल हैं. माओवादी गतिविधियों पर गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में लिखा है कि शहरों में सक्रिय विचारकों की वजह से माओवादी आंदोलन ज़िंदा है और ये कई मायनों में जंगलों में लड़ रहे माओवादी गुरिल्ला कैडर से ज़्यादा ख़तरनाक हैं.
कोबाड गांधी पर माओवादी संगठन के लिए शहरी युवाओं को भर्ती करने का आरोप है. इसी तरह नक्सलियों की मदद करने के आरोप में जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के हेम मिश्रा को महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार किया था. दिल्ली विश्‍वविद्यालय के जीएन साई बाबा को भी महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार किया था. इनका रिश्ता रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट से बताया गया. खुफिया एजेंसियों का मानना है कि नक्सली संगठनों की रणनीति बहुत ही साफ़ है. वे पहले मज़दूर, छात्र और विभिन्न सामाजिक संगठनों में घुसते हैं, फिर उन संगठनों को आंदोलित करते हैं. सड़कों पर आंदोलन करते हैं और फिर उन्हें हिंसक आंदोलन के लिए प्रेरित करते हैं.
गृह मंत्रालय की रणनीति का विश्‍लेषण किया जाए, तो यह निष्कर्ष निकालना आसान है कि जो भी लोग नक्सलवाद को सामाजिक और आर्थिक समस्या मानते हैं, वे नक्सलवाद के हमदर्द और समर्थक की श्रेणी में आ जाएंगे. इसका मतलब यह है कि अब शहरों में कार्यरत-सक्रिय कई सामाजिक कार्यकर्ता, प्रोफेसर, पत्रकार और बुद्धिजीवी खुफिया एजेंसी के निशाने पर आ जाएंगे. खुफिया एजेंसियों के हाथ कोई छोटा-सा भी सुबूत आने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा. देश में जिस तरह से पुलिस काम करती है, उसमें यह भी ख़तरा बना रहेगा कि पुलिस झूठे सुबूतों के आधार पर भी लोगों को गिरफ्तार कर सकती है. नक्सली संगठन से जुड़े किसी व्यक्ति के साथ जाने-अनजाने फोन पर बातचीत करना भी मुसीबत का सबब बन सकता है. इस वजह से कई राज्यों में कई पत्रकार जेल जा चुके हैं. यह आशंका ग़लत नहीं है कि गृह मंत्रालय की इस रणनीति का दुरुपयोग होगा.
अब सवाल यह कि गृह मंत्रालय ने जिन 128 संगठनों को चिन्हित किया है, उनमें शामिल लोग कौन हैं. वे कोई अपराधी नहीं हैं, बल्कि देश के एक ज्वलंत मुद्दे पर एक तार्किक राय रखते हैं. वे अख़बारों में लिखते हैं, सेमिनारों और गोष्ठियों में अपनी राय रखते हैं. कभी-कभी वे टीवी चैनलों की बहस में भी दिखाई देते हैं. हां, उनकी राय सरकार की राय से मेल नहीं खाती है. तो क्या इसका मतलब यह है कि सरकार जिस तरह से सोचती है, पूरे देश को उसी राय का पालन करना होगा? यह प्रजातंत्र के किसी भी वीभत्स रूप में भी उचित नहीं है कि अगर आप सरकार के विरोध में अपनी राय रखते हैं, तो उसे गुनाह माना जाए. यह तो तानाशाही की निशानी है. क्या सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अपने दायित्व का पालन किया है? क्या सरकार उन दूरदराज के क्षेत्रों में बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और रा़ेजगार के अवसर मुहैया करने में सफल हो गई है? उक्त सारी मूलभूत सेवाएं-सुविधाएं सरकार की ओर से जनता के लिए खैरात नहीं है, बल्कि यह उसका अधिकार है. संविधान ने उक्त सेवाएं-सुविधाएं मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी सरकार को दी है. अगर सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारी निभा दी है, तो उसकी दलील पर भरोसा भी किया जा सकता है. और अगर नहीं, तो जनता के अधिकार के लिए बात रखना और लड़ना गुनाह कैसे हो सकता है?
नक्सलवाद को लेकर सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए. सच का सामना और ज़मीनी हक़ीक़त का विश्‍लेषण करके ही अच्छी नीतियों का सृजन किया जा सकता है. नक्सलवाद एक जटिल समस्या है. इसमें स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय तत्वों तक का मिश्रण है. माओवादियों की हिंसा का विस्तार गुंडागर्दी, डकैती, फिरौती से लेकर राज्य के ख़िलाफ़ हिंसक क्रांति तक है. उनके संगठन में शामिल लोगों में भोले-भाले एवं अनपढ़ वनवासियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रकारी तक हैं. उनकी गतिविधियां गांवों में न्यायालय चलाने से लेकर आतंकी हमले अंजाम देने तक फैली हुई हैं. इन सबके अलावा सरकार को आत्मविश्‍लेषण भी करना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि जबसे देश में नव-उदारवादी आर्थिक व्यवस्था अपनाई गई है, तबसे नक्सलवाद का विस्तार तेज हो गया? क्या देश की आर्थिक नीतियों की वजह से गांवों और वनों में रहने वाले लोग मुख्य धारा से अलग-थलग हो गए हैं? अगर विकास की रोशनी उन इलाकों में नहीं पहुंच रही है और उसका फ़ायदा नक्सली संगठन उठाने में सफल हो रहे हैं, तो इसमें कुसूर किसका है? नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकार को सबसे पहले नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की आम जनता का विश्‍वास जीतना होगा, उन इलाकों का विकास करना होगा और वहां के लोगों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ना होगा. जनता के समर्थन के बिना नक्सलवाद खुद-ब-खुद दम तोड़ देगा और शहरों में रहने वाले विचारकों की दलीलें बेमानी हो जाएंगी. स़िर्फ कड़ी कार्रवाई की नीति से, आनन-फानन गिरफ्तारी से नक्सलवाद और भी मजबूत होगा तथा प्रजातंत्र की जड़ें कमज़ोर होंगी.


देश में सक्रिय कुछ माओवादी संगठन

पंजाब
कीर्ति मज़दूर यूनियन
लोक मोर्चा
लोक संग्राम मंच
पंजाब रेडिकल स्टूडेंट यूनियन

हरियाणा
जन चेतना मंच
जागरूक छात्र मोर्चा
दिशा संस्कृति मंच
नौजवान दस्ता

दिल्ली
रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट
कमेटी फॉर रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स
पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया
मेहनतकश मज़दूर मोर्चा
विकल्प (कल्चरल फ्रंट)
नारी मुक्ति संघ
फोरम अगेंस्ट वॉर ऑन पीपुल

गुजरात
गुजरात वर्किंग क्लास विंग
क्रांतिकारी कामदार संगठन
नौजवान भारत सभा

महाराष्ट्र
इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपुल्स लॉयर
रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट
पुरोगामी महिला समिति

कर्नाटक
बगैर हुकुम सक्रामागोलिसी बोराता (शिमोगा)

तमिलनाडु
एंटी इपिरियलिस्ट मूवमेंट
रेडिकल स्टूडेंट यूनियन
रेडिकल यूथ लीगल

केरल
रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट
जनकिया विमोचना मुनानी

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