आधार कार्ड खतरनाक है

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क्या अब इस देश में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का कोई महत्व नहीं रह गया है? यह देश कैसे चलाया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह आदेश दिया कि आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से सभी प्रमुख सचिवों को पत्र लिखने के लिए भी कहा, ताकि किसी भी क़ीमत पर कोर्ट के आदेश की अवहेलना न हो. सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा कि इस आदेश को नज़रअंदाज़ करने वालों को जेल भेजा जाएगा. एक तऱफ, सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड की वैधता पर सुनवाई चल रही है, जिसकी अगली तारीख 13 जुलाई, 2015 को है. बावजूद इसके, सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना जारी है. आधार योजना से पैदा हुए खतरे से आगाह कर रही है चौथी दुनिया की यह रिपोर्ट… 

adhar-card-khatarnak-haiआधार कार्ड को वैधता प्रदान करने वाला बिल संसद में लंबित है. सारे नियम-क़ानूनों को ताक पर रखकर सरकार और सरकारी एजेंसियां पिछले दरवाजे से आधार कार्ड को लागू कर रही हैं. यह तो हद ही हो गई कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए चुनाव आयोग ने आधार कार्ड को चुनाव से जोड़ना शुरू कर दिया है. चुनाव आयोग राष्ट्रीय निर्वाचक नामावली परिशोधन एवं प्रमाणीकरण कार्यक्रम की शुरुआत कर आधार कार्ड को वोटर पहचान-पत्र के साथ जोड़ने का काम कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना स़िर्फ चुनाव आयोग ने नहीं की, बल्कि केंद्रीय मंत्रालयों के अधिकारियों पर भी अब आधार कार्ड बनवाने का दबाव डाला जा रहा है. ऑफिस में उपस्थिति (एटेंडेंस) को आधार से जोड़ने का काम चल रहा है. यहां तक कि रक्षा मंत्रालय से जुड़े संस्थानों को भी आधार से जोड़ने की शुरुआत हो गई है. रेल मंत्रालय टिकट आरक्षण (रिजर्वेशन) को आधार से जोड़ने का काम कर चुका है. स्कूलों में प्रवेश (एडमिशन) के लिए आधार कार्ड, गैस सिलेंडर सब्सिडी के लिए आधार कार्ड, पेंशन के लिए आधार कार्ड, राशनकार्ड के लिए आधार कार्ड, पासपोर्ट के लिए आधार कार्ड, बैंक एकाउंट के लिए आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस के लिए आधार कार्ड यानी हर जगह आधार कार्ड को धड़ल्ले से लागू किया जा रहा है. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार ने शादी के पंजीकरण के लिए भी आधार कार्ड की मांग कर दी है. अब तो सांसदों और पूर्व सांसदों से आधार कार्ड बनवाने के लिए कहा जा रहा है. बताया जा रहा है कि कुछ दिनों के बाद जितने भी बच्चे पैदा होंगे, जन्म के तुरंत बाद यानी उसी वक्त उनके बायोमीट्रिक डाटा इकट्ठा कर लिए जाएंगे और आधार नंबर दे दिया जाएगा. मतलब यह कि सरकार पिछले दरवाजे से आधार को लागू कर रही है और जब भी कोर्ट में सरकार से इस बारे में पूछा जाता है, तो सरकार की तऱफ से यही कहा जाता है कि यह अनिवार्य नहीं है. यह मामला अनिवार्य होने या न होने का नहीं है.
चौथी दुनिया पिछले चार सालों से आधार के बारे में सरकार और लोगों को आगाह करता आया है कि यह कार्ड खतरनाक है. यह न स़िर्फ अवैध है, बल्कि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन भी करता है. दुनिया के किसी भी प्रजातांत्रिक देश में इस तरह की योजना नहीं चलाई जा सकती है. पाकिस्तान अकेला ऐसा देश है, जिसने यह ग़लती की है. क्या हम पाकिस्तान की तरह बनना चाहते हैं, जहां आईएसआई से ज़्यादा जानकारियां सीआईए के पास रहती हैं? देश की सरकार को अब तक यह बात क्यों समझ में नहीं आई है कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, चीन, कनाडा और जर्मनी जैसे देशों में भी इस तरह की योजना शुरू हुई थी, लेकिन जब वे इस योजना से पैदा होने वाले खतरे से अवगत हुए, तो वहां बीच में ही इस योजना को खत्म कर दिया गया. समझने वाली बात यह है कि आधार कार्ड बनाने और उसके ऑपरेशन में डिजिटल डाटा का इस्तेमाल होता है. यह कार्ड बनाने के लिए लोगों की आंखों की पुतलियों और अंगूठे का निशान आदि जैसे बायोमीट्रिक डाटा लिए जाते हैं. फिर उसे पासपोर्ट, बैंक एकाउंट और फोन से जोड़ दिया जाता है. लोगों की व्यक्तिगत जानकारियां एक सर्वर में एकत्र की जाती हैं, जिस पर विदेशी निजी कंपनियों का अधिकार है. समस्या यह है कि जिन कंपनियों को भारत सरकार ने ये अधिकार दिए हैं, उनका प्रबंधन ऐसे लोगों के हाथों में है, जिनके रिश्ते विदेशी खुफिया एजेंसियों से रहे हैं. दूसरी समस्या यह है कि डिजिटल डाटा आसानी से कॉपी किए जा सकते हैं. जिन लोगों ने डिजिटल डाटा एक बार दे दिया, तो समझिए कि वे सुरक्षित नहीं हैं. लोगों की सारी व्यक्तिगत जानकारियां किन लोगों के हाथों में चली जाएंगी और उनका वे क्या इस्तेमाल कर सकते हैं, इस बारे में सोचते ही पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है. भारत में यूआईडी कार्ड की कहानी विप्रो नामक कंपनी के प्रस्ताव से शुरू होती है, जिसे उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सखा नंदन नीलेकणी चला रहे थे. इस दस्तावेज़ का नाम था, स्ट्रेटिजिक विजन ऑन द यूआईडीएआई प्रोजेक्ट. मतलब यह कि यूआईडी की सारी दलीलें, योजना और उसका दर्शन इस दस्ताव़ेज में है. बताया जाता है कि यह दस्तावेज़ अब ग़ायब हो गया है. विप्रो ने यूआईडी की ज़रूरत को लेकर 15 पृष्ठों का एक और दस्ताव़ेज तैयार किया, जिसका शीर्षक है, डज इंडिया नीड ए यूनिक आइडेंटिटी नंबर. इस दस्ताव़ेज में यूआईडी की ज़रूरत को समझाने के लिए विप्रो ने ब्रिटेन का उदाहरण दिया. इस प्रोजेक्ट को इसी दलील पर हरी झंडी दी गई थी. हैरानी की बात यह है कि ब्रिटेन की सरकार ने अपनी योजना को बंद कर दिया. उसने यह दलील दी कि यह कार्ड खतरनाक है, इससे नागरिकों की निजता (प्राइवेसी) का हनन होगा और आम जनता जासूसी की शिकार हो सकती है. अब सवाल यह उठता है कि जब इस योजना की पृष्ठभूमि ही आधारहीन और दर्शनविहीन हो गई, तो फिर सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि वह इसे लागू करने के लिए सारे नियम-क़ानूनों और विरोधों को दरकिनार करने पर आमादा है? कांग्रेस सरकार के जाने के बाद भी यह योजना क्यों लागू है?

सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि जितनी भी बायोमीट्रिक जानकारियां हैं, उनकी देखरेख और ऑपरेशन विदेशी कंपनियों के हाथों में है. उन कंपनियों का रिश्ता ऐसे देशों से है, जो जासूसी कराने के लिए कुख्यात हैं. बायोमीट्रिक जानकारियां उन कंपनियों के हाथों में है, जिन्हें विदेशी खुफिया एजेंसियों के रिटायर्ड अधिकारी चलाते हैं. क्या हम जानबूझ कर अमेरिका और विदेशी एजेंसियों के हाथों अपने देश को ख़तरे में डाल रहे हैं? कुछ समय पहले एक खुलासा हुआ था कि अमेरिका की सुरक्षा एजेंसी एनएसए जिन देशों के इंटरनेट और फोन रिकॉर्ड इकट्ठा कर रही है, उनमें पहला नंबर भारत का है. मजेदार बात यह है कि अमेरिकी सरकार के खुफिया निदेशालय ने भी एक तरह से जासूसी कराने के आरोपों को स्वीकार किया था. निदेशालय ने कहा था कि वह सार्वजनिक तौर पर इस बात का जवाब नहीं देना चाहता, क्योंकि यह उसकी खुफिया नीति का ही एक हिस्सा है. को अमेरिका के इस दुस्साहस, ऐसी निगरानी और जासूसी के ख़िला़फ कड़ा विरोध जताना चाहिए था, लेकिन हुआ ठीक उल्टा. यूपीए सरकार के तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद विरोध करने के बजाय अमेरिकी हरकत को सही ठहराने के लिए उल्टी-पुल्टी दलीलें देने लग गए. सलमान खुर्शीद ने कहा कि यह जासूसी नहीं है, यह तो महज कंप्यूटर अध्ययन और कॉलों के पैटर्न का विश्लेषण है. अगर यह जासूसी नहीं है, तो सलमान खुर्शीद को बताना चाहिए कि जासूसी क्या होती है? सरकार बदल गई, लेकिन रवैया नहीं बदला. तो क्या यह मान लिया जाए कि देश में कांग्रेस की सरकार हो या फिर भाजपा की, विदेशी एजेंसियों के सामने हमने घुटने टेक दिए हैं या उन्हें रोकने में हम सक्षम नहीं हैं? हक़ीक़त तो इससे भी ज़्यादा खौफनाक है. भारत सरकार को इस बात की ़खबर तक नहीं है कि हमने आधार योजना लागू करके देश को ़खतरे में डाल दिया है.
ग़ौरतलब है कि अमेरिका के जासूसी प्रकरण पर उसकी नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी (एनएसए) के साथ काम करने वाले एडवर्ड स्नोडेन ने पिछले दिनों कई खुलासे किए थे. उन्होंने बताया था कि आज के इन्फार्मेशन वारफेयर में भारत कई देशों के निशाने पर है. स्थिति ़खतरनाक है और इससे निपटने की ज़रूरत थी. लेकिन, भारत सरकार ने इससे ठीक उल्टा काम किया. आधार योजना के तहत योजना आयोग ने एर्नेस्ट एंड यंग, साफ्रान ग्रुप, एसेंचर, इन-क्यू-टेल एवं मोंगो डीबी जैसी कंपनियों से करार किए. ये वही कंपनियां हैं, जिन्हें हमने आधार से जुड़े बायोमीट्रिक डाटा की देखरेख और इस्तेमाल का अधिकार दे दिया है. यह देश की सुरक्षा और लोगों के मौलिक अधिकारों के साथ सरासर मज़ाक है. ये कंपनियां उन देशों की हैं, जिनका गठजोड़ पूरी दुनिया पर निगरानी के लिए नेटवर्क तैयार कर रहा है. स्नोडेन ने ही अमेरिकी और ब्रिटिश जासूसी कार्यक्रम का सनसनीखेज ब्यौरा मीडिया को लीक किया था. स्नोडेन के खुलासे के मुताबिक़, अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी एनएसए एक्स-कीस्कोर (द-घशूीलेीश) नामक जासूसी कार्यक्रम चलाती है. इस कार्यक्रम के तहत दुनिया भर से डाटा हैक करके जानकारियां एकत्र की जाती हैं. 2008 में एक्स-कीस्कोर की एक प्रशिक्षण सामग्री में एक नक्शा पेश किया गया था, जिसमें दुनिया भर में लगे सर्वर का ब्यौरा था. चौंकाने वाली बात यह है कि उस नक्शे के मुताबिक़, उनमें से एक अमेरिकी जासूसी सर्वर भारत की राजधानी नई दिल्ली के किसी समीपवर्ती इलाके में लगा हुआ प्रतीत होता है.
अब सवाल यह है कि अमेरिका के इस खुफिया कार्यक्रम को चलाता कौन है? टेक्नोलॉजी कहां से आती है? सर्वर कौन लगाता है? डाटा चुराने की प्रणाली कौन स्थापित करता है? समझने वाली बात यह है कि जिन कंपनियों को यूआईडी ने हमारी जानकारियां सुपुर्द की हैं, वे वही कंपनियां हैं, जो दुनिया भर में निगरानी प्रणाली स्थापित करने में माहिर मानी जाती हैं. दूसरे विश्व युद्ध के बाद और भारत की आज़ादी से पहले एक नेटवर्क विकसित हुआ था. इसके गठन का एकमात्र उद्देश्य दूसरे देशों की निगरानी करना था. इसमें अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी एनएसए, इंग्लैंड के गवर्नमेंट कम्युनिकेशन हेडक्वाटर्स, कनाडा की कम्युनिकेशन सिक्योरिटी इस्टैब्लिशमेंट, ऑस्ट्रेलिया का सिग्नल डायरेक्टोरेट और न्यूजीलैंड का गवर्नमेंट कम्युनिकेशन सिक्योरिटी ब्यूरो आदि शामिल हैं. अब इस गुट में कई और देश भी शामिल हो चुके हैं. समझने वाली बात यह है कि ये कंपनियां कई देशों में सक्रिय हैं. इनके पास वे तमाम तकनीक उपलब्ध हैं, जिनसे ये किसी भी देश की इंटरनेट कंपनियों के डाटा एकत्र कर सकती हैं, सर्वर हैक कर सकती हैं और फोन सुन सकती हैं. इन कंपनियों की पहुंच कई देशों में है और ये किस तरह और किस स्तर पर काम कर सकती हैं, इसी का खुलासा स्नोडेन ने किया था. सवाल यह है कि उस खुलासे के बाद भारत सरकार ने क्या किया? यह किसी को नहीं मालूम है. एक तऱफ देश की सरकार है, जो देश की सुरक्षा को लेकर निष्क्रिय है और दूसरी तऱफ देश की संसद है, जहां वोट बैंक की राजनीति के अलावा कुछ नहीं होता. क्या यह सरकार और संसद का दायित्व नहीं है कि वह इन विषयों पर चर्चा करे और उचित कार्रवाई करे, ताकि यह भरोसा हो सके कि देश सुरक्षित है?
ऐसे माहौल में क्या संसद चुप बैठी रहेगी? क्या भारत को स्वयं को सुरक्षित करने के लिए क़दम नहीं उठाने चाहिए? लेकिन, हम बिल्कुल उल्टे ़फैसले लेते हैं. ऐसी क्या वजह है कि सरकार देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने पर आमादा है? जबकि यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति भी इसका विरोध कर चुकी है. समिति ने विशिष्ट पहचान अंक (नंबर) जैसे ख़ु़िफया उपकरणों द्वारा नागरिकों पर सतत नज़र रखने और उनके जैवमापक रिकॉर्ड तैयार करने पर आधारित तकनीकी शासन की पुरजोर मुखालफत की और इसे बंद करने का सुझाव दिया था. यूपीए सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन आज तो भाजपा की सरकार है, तो फिर इन सवालों पर क्यों चुप्पी है? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ़िखला़फ जाकर आधार योजना को लागू करने और उसे अनिवार्य बनाने पर सरकार आ़िखर क्यों आमादा है? सवाल तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या अब तक एकत्र किए गए बायोमीट्रिक डाटा को प्राधिकरण ने किसी विदेशी कंपनी के साथ साझा (शेयर) किया गया है? कितना डाटा अब तक विदेशी कंपनियों को हाथ लग चुका है? अगर ये जानकारियां विदेशी एजेंसियों के हाथ लग चुकी हैं, तो इसका एक मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का कोई मतलब नहीं है, जिसमें उसने कहा कि ये जानकारियां किसी के साथ साझा (शेयर) नहीं की जा सकती हैं. और, यह भी मान लेना चाहिए कि हम विदेशी खुफिया एजेंसियों की निगरानी में आ चुके हैं.
नरेंद्र मोदी सरकार को आधार योजना पर पुनर्विचार करना चाहिए. अगर नहीं, तो कम से कम इतना उपकार वह ज़रूर कर दे कि देश की जनता और संसद को बता दे कि इस योजना को किस क़ानून के तहत लागू किया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने के पीछे कौन सी वजह है? इससे पहले यह बताया जाए कि लोगों की आंखों की पुतलियों, अंगूठा निशान और बाकी बायोमीट्रिक जानकारियां किस क़ानून के तहत इकट्ठा की जा रही हैं? सरकार यह भी बताए कि लोगों के बायोमीट्रिक डाटा हम किन-किन देशों और कंपनियों को सौंपने का पाप कर रहे हैं? साथ ही उन कंपनियों के इतिहास के बारे में भी बताया जाए, जिन्हें खुफिया एजेंसियों के लोग चला रहे हैं. बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है, समाधान ढूंढना कठिन है. क्या हम भारत में एक मेल सर्वर नहीं बना सकते? क्या हम ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकते, जिसमें देशवासियों के बायोमीट्रिक डाटा विदेश न भेजने पड़ें? इन तमाम सवालों के जवाब अगर सरकार के पास नहीं हैं, तो विपक्ष ही देश की जनता को सच्चाई बताए. अगर विपक्ष को भी नहीं पता है, तो देश में संविधान और क़ानून का राज ख़त्म करने के पाप में सत्ताधारी दल और विपक्ष, दोनों बराबर के हिस्सेदार होंगे.


वह सच, जो छिपा दिया गया

चौथी दुनिया ने पहले भी आधार कार्ड को लेकर एक रिपोर्ट छापी थी, जिससे यह साबित हुआ कि किस तरह यूआईडीएआरई ने देश की सुरक्षा के साथ समझौता किया. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआरई) ने कार्ड बनाने के लिए तीन कंपनियों को चुना-एसेंचर, महिंद्रा सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन. इन तीनों कंपनियों पर ही इस कार्ड से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारियां हैं. जब इन तीनों कंपनियों पर ग़ौर करते हैं, तो डर-सा लगता है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं. इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रॉनिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजें बेचती है. अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट और यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के सारे काम इसी कंपनी के पास हैं. यह पासपोर्ट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक बनाकर देती है. इस कंपनी के डायरेक्टरों के बारे में जानना ज़रूरी है. इसके सीईओ ने 2006 में कहा था कि उन्होंने सीआईए के जॉर्ज टेनेट को कंपनी के बोर्ड में शामिल किया है. जॉर्ज टेनेट सीआईए के डायरेक्टर रह चुके हैं और उन्होंने ही इराक के ख़िला़फ झूठे सुबूत इकट्ठा किए थे कि उसके पास महाविनाश के हथियार हैं. अब कंपनी की वेबसाइट पर उनका नाम नहीं है, लेकिन जिनके नाम हैं, उनमें से किसी का रिश्ता अमेरिका के आर्मी टेक्नोलॉजी साइंस बोर्ड, तो किसी का रिश्ता आर्म्ड फोर्स कम्युनिकेशन एंड इलेक्ट्रॉनिक एसोसिएशन, आर्मी नेशनल साइंस सेंटर एडवाइजरी बोर्ड और ट्रांसपोर्ट सिक्योरिटी जैसे संगठनों से रहा है. इस सवाल का जवाब सरकार को देना चाहिए कि यूआईडी वर्ल्ड बैंक की ई-ट्रांसफॉर्म इनिशिएटिव (ईटीआई) का हिस्सा है या नहीं? यह प्रोजेक्ट 23 अप्रैल, 2010 को वाशिंगटन में शुरू किया गया. सरकार को यह बताना चाहिए कि इस प्रोजेक्ट का मक़सद क्या है, जिसे दुनिया के कई देशों में लागू किया जा रहा है. वर्ल्ड बैंक के इस प्रोजेक्ट में एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन, आईबीएम, इनटेल और माइक्रोसॉफ्ट की भी भागीदारी है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन की यह हक़ीक़त सरकार ने जनता से क्यों छिपाकर रखी कि इस कंपनी के बोर्ड में अमेरिकी खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारी रह चुके हैं. अब इस कंपनी का विलय साफ्रान नामक कंपनी में हो चुका है. यूआईडी का विरोध सरकार के अंदर से हो रहा है. सरकार के नज़दीकी भी अब इस प्रोजेक्ट पर सवाल उठाने लगे हैं. कई सामाजिक कार्यकर्ता, रिटायर्ड न्यायाधीश, अधिकारी, बुद्धिजीवी एवं विशेषज्ञ इसका विरोध कर रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि इतना सब कुछ हो रहा है, लेकिन संसद में इसकी चर्चा तक नहीं हुई और न विपक्ष इस पर कोई दबाव बना रहा है.


यूआईडी कार्ड नाज़ियों की याद दिलाता है

अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में यूएस होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम है. यहां द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों के नरसंहार से जुड़ी चीजें हैं. इस म्यूजियम में एक मशीन रखी है, जिसका नाम है, होलेरिथ डी-11. इस मशीन को आईबीएम कंपनी ने द्वितीय विश्व युद्ध से पहले बनाया था. यह एक पहचान-पत्र की छंटाई करने वाली मशीन है. तो सवाल यह उठता है कि इस मशीन का होलोकॉस्ट म्यूजियम में क्या काम? दरअसल, यहूदियों के नरसंहार से इस मशीन का गहरा रिश्ता है. हिटलर ने 1933 में जर्मनी में जनगणना कराई थी. यह जनगणना आईबीएम कंपनी ने की थी. इस कंपनी ने जर्मनी में न स़िर्फ जनगणना की, बल्कि जातिगत जनगणना की. यहूदियों की गणना की और साथ में एक पहचान-पत्र भी दिया था. म्यूजियम में रखी यह मशीन पहचान-पत्र को बांचने का काम करती थी. इसी मशीन ने यहूदियों की पहचान की थी, उनका ठिकाना बताया था. अगर यह मशीन न होती, तो नाज़ियों को यहूदियों के नाम-पते की जानकारी न मिलती. नाज़ियों को यहूदियों की सूची आईबीएम कंपनी ने दी थी. आईबीएम और हिटलर के इस गठजोड़ ने इतिहास के सबसे ख़तरनाक नरसंहार को अंजाम दिया. यूआईडी योजना हमें हिटलर और यहूदियों के नरसंहार के उसी भयानक दौर की याद दिलाती है. 1933 और 2015 में एक बड़ा फर्क़ भी है. हिटलर के पास तो यहूदियों के घरों के पते थे, लेकिन यूआईडी के मामले में तो कोई छिप भी नहीं सकता. यूआईडी के साथ तो बैंक एकाउंट और मोबाइल फोन भी जोड़ा जा रहा है. ऐसी हालत में किसी का छिपना संभव नहीं है. क्या मोदी सरकार या कोई राजनीतिक पार्टी यह बात दावे के साथ कह सकती है कि भारत में यूआईडी का ग़लत इस्तेमाल नहीं होगा? जो हाल यहूदियों का जर्मनी में हुआ, वैसी स्थिति भारत में पैदा हो सकती है, ऐसा ख़तरा हमेशा बना रहेगा. सरकार जिस तरह से इस कार्ड को लागू करना चाहती है, उससे तो किसी भी व्यक्ति का छिपना मुश्किल हो जाएगा. इस कार्ड के लागू होते ही फोन या एटीएम के इस्तेमाल मात्र से किसी का भी पता-ठिकाना मालूम किया जा सकता है. क्या भारत सरकार इस बात की गारंटी दे सकती है कि अगर कभी नाजी या उससे भी ख़तरनाक किस्म के लोग सत्ता में आ गए, तो इस कार्ड का इस्तेमाल दंगा, हिंसा और हत्या के लिए नहीं किया जाएगा? इस बात की गारंटी कोई नहीं दे सकता है. क्या यूआईडी या नेशनल पापुलेशन रजिस्टर वही कर रहे हैं, जो जर्मनी में किया गया? सवाल यह भी उठता है कि अगर देश के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और विशेषज्ञ इस तरह के ख़तरनाक सवाल उठा रहे हैं, तो उसका जवाब सरकार क्यों नहीं देती? इस कार्ड को लेकर संसद में बहस क्यों नहीं हुई? इस कार्ड को बनाने से पहले संसद को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया? इस कार्ड को लेकर कई भ्रांतियां हैं, जिन पर खुली बहस की ज़रूरत है.


मोदी सरकार इन सवालों का जवाब दे

  1. 23 सितंबर 2013, 26 नवंबर 2013 और 24 मार्च 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, देश के नागरिकों पर आधार कार्ड जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता है. फिर भी सरकारी एजेंसियां इसे अनिवार्य क्यों बना रही हैं?
  2. देशवासियों के पर्सनल सेंसिटिव बायोमीट्रिक डाटा विदेश भेजे जा रहे हैं या नहीं?
  3. क्या आधार से जुड़े डाटा के इस्तेमाल और उनके ऑपरेशन का अधिकार विदेशी निजी कंपनियों को दिया गया है? इन कंपनियों का इतिहास क्या है? क्या इन कंपनियों के रिश्ते विदेशी खुफिया एजेंसियों से हैं?
  4. आधार योजना का काम सरकारी एजेंसियों के बजाय विदेशी कंपनियों के हाथों में क्यों है?
  5. आधार के नागरिक इस्तेमाल को सैन्य इस्तेमाल से क्यों जोड़ दिया गया?
  6. सरकार क्यों नहीं बताती कि इस योजना पर कितना पैसा ख़र्च होगा?
  7. आधार को लेकर संसद में बिल लंबित है. बिल को बिना पास किए यह योजना क्यों जारी है?
  8. लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा यूआईडी योजना पर पुनर्विचार करने की बात कहती रही. चुनाव के बाद भाजपा का स्टैंड क्यों बदल गया?
  9. भाजपा ने चुनाव से पहले कहा था कि आधार योजना को लेकर पार्टी की दो चिंताएं हैं, एक तो इसका क़ानूनी आधार और दूसरा सुरक्षा का मुद्दा. क्या उक्त चिंताएं अब ख़त्म हो गई हैं?
  10. पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी ऑन इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की साइबर सिक्योरिटी रिपोर्ट के मुताबिक़, क्या आधार योजना राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने जैसा और नागरिकों की संप्रभुता और निजता के अधिकार पर हमला नहीं है?
  11. इस योजना की शुरुआत कब और कैसे हुई और किस आधार पर हुई? यूपीए सरकार को नंदन नीलेकणी द्वारा दिया गया प्रस्ताव कहां है? उसे अविलंब सार्वजनिक किया जाए.
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