यह कार्ड ख़तरनाक है- 2

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aadhar cardयूआईडी कार्ड की कहानी इस तरह शुरू होती है. देश में एक विशिष्ट पहचान पत्र के लिए विप्रो नामक कंपनी ने एक दस्तावेज तैयार किया. इसे प्लानिंग कमीशन के पास जमा किया गया. इस दस्तावेज का नाम है स्ट्रेटिजिक विजन ऑन द यूआईडीएआई प्रोजेक्ट. मतलब यह कि यूआईडी की सारी दलीलें, योजना और उसका दर्शन इस दस्तावेज में है. बताया जाता है कि यह दस्तावेज अब ग़ायब हो गया है. विप्रो ने यूआईडी की ज़रूरत को लेकर 15 पेजों का एक और दस्तावेज तैयार किया, जिसका शीर्षक है, डज इंडिया नीड ए यूनिक इडेंटिटी नंबर. इस दस्तावेज में यूआईडी की ज़रूरत को समझाने के लिए विप्रो ने ब्रिटेन का उदाहरण दिया. इस प्रोजेक्ट को इसी दलील पर हरी झंडी दी गई थी. हैरानी की बात यह है कि ब्रिटेन की सरकार ने अपनी योजना को बंद कर दिया. उसने यह दलील दी कि यह कार्ड खतरनाक है, इससे नागरिकों की प्राइवेसी का हनन होगा और आम जनता जासूसी की शिकार हो सकती है. अब सवाल यह उठता है कि जब इस योजना की पृष्ठभूमि ही आधारहीन और दर्शनविहीन हो गई तो फिर सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि वह इसे लागू करने के लिए सारे नियम-क़ानूनों और विरोधों को दरकिनार करने पर आमादा है. क्या इसकी वजह नंदन नीलेकणी हैं, जो यूआईडीएआई के चेयरमैन होने के साथ-साथ सरकार चलाने वाले महाशक्तिशाली राजनेताओं के क़रीबी हैं. क्या यह विदेशी ताक़तों और मल्टीनेशनल कंपनियों के इशारे पर किया जा रहा है. देश की जनता को इन तमाम सवालों के जवाब जानने का हक़ है, क्योंकि यह काम जनता के क़रीब 60 हज़ार करोड़ रुपये से किया जा रहा है, जिसे सरकार के ही अधिकारी अविश्वसनीय, अप्रमाणिक और दोहराव बता रहे हैं.

हम सुपर सोनिक युग में जी रहे हैं. इसका असर सरकार पर सबसे ज़्यादा दिखता है. बाज़ार, विज्ञान, तकनीक, ब्रांडिंग, कंपनियां, राजनीति, शेयर और विदेशी दौरे की ऊहापोह में सरकार इतनी उलझ सी गई है कि उसके पास दो पल शांति से बैठकर अपनी नीतियों पर विचार करने का समय नहीं रहा. अगर सरकार अपने ही द्वारा लिए गए फैसलों पर तसल्ली से पुनर्विचार करे तो वह स्वयं कई फैसलों को बदलने की ज़रूरत महसूस करेगी. यूआईडी एक ऐसी योजना है, जिस पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है. वह इसलिए, क्योंकि इस कार्ड का इस्तेमाल इतिहास के सबसे खतरनाक जनसंहार का ज़रिया बन सकता है, क्योंकि यह कार्ड सरकार में विरोधाभास पैदा कर रहा है, यह कार्ड बनाने वाली कंपनियों के तार विदेशी खुफिया एजेंसियों से हैं. इसे लागू करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. यूआईडीएआई के चेयरमैन नंदन नीलेकणी ने देश के साथ-साथ सरकार को भी गुमराह किया है.

आधार कार्ड यानी यूनिक आईडेंटिटी कार्ड का सपना चकनाचूर होता दिख रहा है. चारों तरफ से इस प्रोजेक्ट का विरोध हो रहा है. राज्य सरकारें, नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और विशेषज्ञ इस प्रोजेक्ट पर सवाल उठा रहे हैं. केंद्र सरकार स्वयं अंतर्विरोध का शिकार हो रही है. यही वजह है कि कभी गृह मंत्रालय तो कभी वित्त मंत्रालय यूआईडीएआई (यूनिक आईडेंटिटी कार्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया) की मांगों को ठुकरा देता है. खबर यह भी है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अलग से कार्ड बनाने का फैसला लिया है. इतना ही नहीं, सरकार के विभिन्न विभागों में असहमति की वजह से सेंसस कमिश्नर यानी जनगणना आयुक्त यूआईडी की तरह अलग से एक नेशनल कार्ड जारी करेंगे. इस विरोधाभास को खत्म करने के लिए योजना आयोग भी माथापच्ची कर रहा है. जनगणना आयुक्त के मुताबिक, यूआईडी अथॉरिटी जो काम कर रही है, वह दोहराव है, यह काम उनके विभाग का है. नागरिकता क़ानून 1955 के  मुताबिक़, जनसांख्यिकी संबंधी सूचनाओं को संग्रहीत करने का अधिकार स़िर्फ उनके विभाग को है. अगर यह काम यूआईडीएआई  करती है तो यह क़ानून का उल्लंघन है. उनका मानना है कि यूआईडी के  लिए संग्रहीत किया गया डाटा अविश्वसनीय है, क्योंकि यह प्रमाणिक नहीं है. पहचान पत्र को लेकर एक बिल संसद में है. मामला स्टैंडिंग कमेटी गया, जिसके चेयरमैन यशवंत सिन्हा हैं. इस कमेटी के एक सदस्य के मुताबिक़, स्टैंडिंग कमेटी के ज़्यादातर सदस्य यूआईडी की दलीलों से ना़खुश हैं. सरकार इस कार्ड को ज़बरदस्ती लोगों पर थोप रही है. गैस कनेक्शन से लेकर फोन का सिम लेने के लिए इस कार्ड को ज़रूरी बनाया जा रहा है, जबकि इस कार्ड की हैसियत नागरिकता प्रमाणपत्र की नहीं है. अब समझ में नहीं आता है कि जब पहले से ही देश की जनता के पास राशनकार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, पैनकार्ड और वोटिंग कार्ड मौजूद है तो फिर सरकार नागरिकों को अलग से दो-तीन कार्ड देने पर क्यों आमादा है. यूआईडी पहले से ही विवादों में घिरा है. जैसे-जैसे समय बीत रहा है, इसकी असलियत सामने आ रही है.

क्या भारत की सरकार इस बात की गारंटी दे सकती है कि अगर कभी नाजी या उससे भी खतरनाक किस्म के लोग सत्ता में आ गए तो इस कार्ड का इस्तेमाल दंगा, हिंसा और हत्या के लिए नहीं किया जाएगा. जो हाल यहूदियों का जर्मनी में हुआ, वैसी स्थिति भारत में पैदा हो सकती है, ऐसा खतरा हमेशा बना रहेगा.

हमारे देश की सरकार अजीबोग़रीब है. इसे सपने दिखाने में महारथ हासिल है. यूनिक आईडेंटिटी कार्ड यानी यूआईडी को लेकर पता नहीं कितने हवाई किले बनाए गए. अ़खबारों में, टीवी पर, सेमिनारों में और कई विशिष्ट लोगों के ज़रिए यह समझाया गया था कि यह अब तक का सबसे सटीक पहचान पत्र बनेगा. इसमें कोई गड़बड़ी की गुंजाइश ही नहीं है. कार्ड बनने लगे हैं. अब तक कुल छह करोड़ यूआईडी कार्ड बन गए हैं. हैरानी की बात यह है कि इनमें से क़रीब एक करोड़ कार्ड बेकार हो गए हैं, उन पर पता ग़लत था. अधिकारी और मीडिया इसे देश की जनता की ही ग़लती बता रहे हैं. जिस देश में 48 ़फीसदी लोग अनपढ़ हैं, जो स्वयं अपना फॉर्म नहीं भर सकते तो ग़लतियां तो होंगी ही. इस योजना को बनाने वालों को यह पहले से पता होना चाहिए था कि देश की लगभग आधी आबादी अपने हस्ताक्षर नहीं कर सकती है. यही वजह है कि यूआईडीएआई को लगातार इस तरह की शिकायतें मिल रही हैं कि यूआईडी नंबर के लिए ग़लत पता लिखा है. इस घटना से दूसरा सवाल उठता है. क्या कोई ग़लत पते भर कर यूआईडी बना सकता है. अगर बना सकता है तो भविष्य में भी ग़लत पते पर यूआईडी बनते रहेंगे. सवाल कार्ड बनाने वाले अधिकारियों और यूआईडीएआई के चेयरमैन नंदन नीलकेणी से पूछना चाहिए कि इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई और इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है. समस्या स़िर्फ यही नहीं है. दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में कुछ बुजुर्ग यूआईडी बनवाने पहुंचे. उन्होंने हाथों को जब मशीन पर रखा तो उसने उनके हाथों की रेखाओं को पढ़ने से इंकार कर दिया. पता चला कि 65 साल से ज़्यादा के बुजुर्गों के सूखे हाथों की रेखाओं को मशीन पढ़ ही नहीं सकती. नंदन नीलेकणी साहब इस कार्ड की टेक्नोलॉजी के बारे में कई बार व्याख्यान कर चुके हैं. यह कितनी सर्वोत्तम टेक्नोलॉजी द्वारा तैयार किया जा रहा है, अ़खबारों में इसके बारे में कसीदे हर दिन छपते हैं. हक़ीक़त यह है कि यूआईडी बनवाने की हसरत रखने वाले बुजुर्ग बड़ी संख्या में उदास होकर लौट रहे हैं.

चौथी दुनिया ने पहले भी इस कार्ड को लेकर एक रिपोर्ट छापी थी, जिससे यह साबित हुआ कि किस तरह यूआईडीएआई ने देश की सुरक्षा के साथ समझौता किया. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआर्ई) ने कार्ड बनाने के लिए तीन कंपनियों को चुना-एसेंचर, महिंद्रा सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन. इन तीनों कंपनियों पर ही इस कार्ड से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारियां हैं. इन तीनों कंपनियों पर ग़ौर करते हैं तो डर सा लगता है.

एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं. इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रानिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजें बेचती है. अमेरिका के होमलैंड सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट और यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के सारे काम इसी कंपनी के पास हैं. यह पासपोर्ट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक बनाकर देती है. इस कंपनी के डायरेक्टरों के बारे में जानना ज़रूरी है. इसके सीईओ ने 2006 में कहा था कि उन्होंने सीआईए के जॉर्ज टेनेट को कंपनी बोर्ड में शामिल किया है. जॉर्ज टेनेट सीआईए के डायरेक्टर रह चुके हैं और उन्होंने ही इराक़ के खिला़फ झूठे सबूत इकट्ठा किए थे कि उसके पास महाविनाश के हथियार हैं. अब कंपनी की वेबसाइट पर उनका नाम नहीं है, लेकिन जिनका नाम है, उनमें से किसी का रिश्ता अमेरिका के आर्मी टेक्नोलॉजी साइंस बोर्ड, आर्म्ड फोर्स कम्युनिकेशन एंड इलेक्ट्रानिक एसोसिएशन, आर्मी नेशनल साइंस सेंटर एडवाइजरी बोर्ड और ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी जैसे संगठनों से रहा है.

इस सवाल का जवाब नंदन नीलेकणी और सरकार को देना चाहिए कि यूआईडी वर्ल्ड बैंक की ई-ट्रांसफॉर्म इनिशिएटिव (ईटीआई) का हिस्सा है. इस प्रोजेक्ट को 23 अप्रैल, 2010 को वाशिंगटन में शुरू किया गया. सरकार को यह बताना चाहिए कि इस प्रोजेक्ट का मक़सद क्या है, जिसे दुनिया के कई देशों में लागू किया जा रहा है. वर्ल्ड बैंक के इस प्रोजेक्ट में एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन, आईबीएम, इनटेल और माइक्रोसॉफ्ट की भी भागीदारी है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन की यह हक़ीक़त सरकार ने जनता से क्यों छुपाकर रखी कि इस कंपनी के बोर्ड में अमेरिकी खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारी रह चुके हैं. यूआईडी का विरोध सरकार के अंदर से हो रहा है. सरकार के नज़दीकी भी अब इस प्रोजेक्ट पर सवाल उठाने लगे हैं. कई सामाजिक कार्यकर्ता, रिटायर्ड न्यायाधीश, अधिकारी, बुद्धिजीवी एवं विशेषज्ञ इसका विरोध कर रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि इतना सब कुछ हो रहा है, लेकिन संसद में इसकी चर्चा तक नहीं हुई और न ही विपक्ष इस पर कोई दबाव दे रहा है.

यूआईडी कार्ड ना़जियों की याद दिलाता है

अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में यूएस होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम है. यहां द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों के नरसंहार से जुड़ी चीजें हैं. इस म्यूजियम में एक मशीन रखी है, जिसका नाम है होलेरिथ डी-11. इस मशीन को आईबीएम कंपनी ने द्वितीय विश्व युद्ध से पहले बनाया था. सवाल यह उठता है कि इस मशीन का होलोकॉस्ट म्यूजियम में क्या काम? यहूदियों के विनाश से इस मशीन का गहरा रिश्ता है. यह एक पहचान पत्र की छंटाई करने वाली मशीन है, जिसका इस्तेमाल हिटलर ने 1933 में जनगणना करने में किया था. यही वह मशीन है, जिसके ज़रिए हिटलर ने यहूदियों की पहचान की थी. अगर यह मशीन न होती तो नाज़ियों को यहूदियों के नामों और पतों की जानकारी न मिलती. नाज़ियों को यहूदियों की लिस्ट आईबीएम कंपनी ने दी थी. यह कंपनी जर्मनी में जनगणना करने के काम में थी, जिसने न स़िर्फ जातिगत जनगणना की, यहूदियों की गणना की, बल्कि उनकी पहचान भी कराई. आईबीएम और हिटलर के इस गठजोड़ ने इतिहास के सबसे खतरनाक जनसंहार को अंजाम दिया. यह योजना हिटलर, दूसरे विश्व युद्ध और उसके बाद के दौर की याद दिलाती है.

सरकार ने खास तौर पर जर्मनी और आम तौर पर यूरोप के अनुभवों को नज़रअंदाज़ करके इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी है. जबकि यह बात दिन के उजाले की तरह सा़फ है कि निशानदेही के यही औजार बदले की भावना से किन्हीं खास धर्मों, जातियों, क्षेत्रों या आर्थिक रूप से असंतुष्ट तबकों के खिला़फ भी इस्तेमाल में लाए जा सकते हैं. यह एक खतरनाक स्थिति है. शक इसलिए भी होता है, क्योंकि जिस तरह से अ़खबारों में खबरें छपवाई जा रही हैं, वह बिल्कुल प्रायोजित सा दिखता है. यह नहीं भूलना चाहिए कि इस यूनिक आईडेंटिटी कार्ड में हिटलर की जर्मनी जैसी स्थिति बनाने की क्षमता है.

जो हाल यहूदियों का जर्मनी में हुआ, वैसी स्थिति भारत में पैदा हो सकती है, ऐसा खतरा हमेशा बना रहेगा. हम 1933 में नहीं, 2011 में जी रहे हैं. सरकार जिस तरह से इस कार्ड को लागू करना चाहती है, उससे तो किसी भी व्यक्ति का छुपना मुश्किल हो जाएगा. इस कार्ड के लागू होते ही फोन या एटीएम के इस्तेमाल मात्र से किसी का भी ठिकाना पता किया जा सकता है. क्या भारत की सरकार इस बात की गारंटी दे सकती है कि अगर कभी नाजी या उससे भी खतरनाक किस्म के लोग सत्ता में आ गए तो इस कार्ड का इस्तेमाल दंगा, हिंसा और हत्या के लिए नहीं किया जाएगा. इस बात की गारंटी कोई नहीं दे सकता है. क्या यूआईडी या नेशनल पापुलेशन रजिस्ट्रार वही कर रहे हैं, जो जर्मनी में किया गया. सवाल यह भी उठता है कि अगर देश के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और विशेषज्ञ इस तरह के खतरनाक सवाल उठा रहे हैं तो उसका जवाब सरकार क्यों नहीं देती. इस कार्ड को लेकर संसद में बहस क्यों नहीं हुई. इस कार्ड को बनाने से पहले संसद को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया. इस कार्ड को लेकर कई भ्रांतियां हैं, जिन पर खुली बहस की ज़रूरत है.

नंदन नीलेकणी सुपर मैन हैं

यूआईडी को लेकर जब भी कोई जिम्मेदार व्यक्ति मुंह खोलता है, अलग दलीलें दे जाता है. कभी ग़रीबों को रोज़गार, कभी मनरेगा, कभी सब्सिडी तो कभी स्कूल में बच्चों के एडमिशन, कभी-कभी पीडीएस सिस्टम और पता नहीं क्या-क्या. ऐसे भ्रम फैलाया जा रहा है, जैसे कि यह कोई अलादीन का चिराग है. नंदन नीलेकणी यूआईडीएआई के चेयरमैन हैं. वह भी अलग-अलग समय पर अलग-अलग बयान देते हैं, लेकिन उन्होंने यूआईडी की असलियत नेल्सन कंपनी के कंज्यूमर 360 के कार्यक्रम में बताई. उन्होंने कहा कि भारत के एक तिहाई कंज्यूमर बैंकिंग और सामाजिक सेवा की पहुंच से बाहर हैं. ये लोग ग़रीब हैं, इसलिए खुद बाज़ार तक नहीं पहुंच सकते. पहचान नंबर मिलते ही मोबाइल फोन के ज़रिए इन तक पहुंचा जा सकता है. यूआईडी सिस्टम से कंपनियों को फायदा पहुंचेगा. बाज़ार को वैसे ही मुक्त कर दिया गया है. विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं, वह भी खुदरा बाज़ार में. नंदन नीलेकणी ने तो असलियत बता दी कि देश का इतना पैसा उद्योगपतियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च किया जा रहा है. भारत में नव उदारवाद के जनक मनमोहन सिंह का वरदहस्त कहें या फिर सरकार के शीर्ष राजनेताओं की नजदीकियां, नंदन नीलेकणी आज देश के सबसे जिम्मेदार व्यक्ति हैं. वह पांच सरकारी प्राधिकरणों और उपक्रमों के चेयरमैन हैं और 6 के सदस्य.

अध्यक्ष

  • टेक्नालॉजी एडवाइजरी ग्रुप ऑन यूनिक प्रोजेक्ट (टीएजीयूपी)
  • यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईडीएआई)
  • कमेटी ऑन इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन (ईटीसी)
  • इंटर-मिनिस्ट्रियल टास्क फोर्स टू स्ट्रीम लाइन द सब्सिडी डिस्ट्रीब्यूशन मैकेनिज्म
  • गवर्नमेंट ऑफ इंडिया आईटी टास्क फॉर पॉवर सेक्टर

सदस्य

  • राष्ट्रीय ज्ञान आयोग
  • रिव्यू कमेटी ऑफ जवाहर लाल नेहरू नेशनल अर्बन रेनेवल मिशन
  • ई-गवर्नेंस का राष्ट्रीय सलाहकार समूह
  • सेबी की उपसमिति
  • भारतीय रिजर्व बैंक का कॉरपोरेट गवर्नेंस सलाहकार समूह
  • प्रधानमंत्री राष्ट्रीय दक्षता विकास परिषद

वैसे किसी पर व्यक्तिगत सवाल उठाना उचित नहीं होता है, लेकिन सरकार से यह तो पूछा ही जा सकता है कि क्या देश में प्रतिभाओं की कमी है, क्या इन कमेटियों का सदस्य या चेयरमैन बनने की काबिलियत किसी में नहीं है या फिर सरकार नंदन नीलेकणी की प्रतिभा से इतनी प्रभावित है कि उनसे बेहतर या समकक्ष उसे कोई दूसरा व्यक्ति पूरे देश में नहीं मिला?

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